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राजा परीक्षित श्राप की कथा का किया वर्णन, देवी चित्रलेखा

कटेरा (झाँसी) कस्बे के झलकारी बाई स्टेडियम में चल रही भागवत कथा के दूसरे दिन पूज्या देवी चित्रलेखा जी ने भक्ति पर प्रसंग और राजा परीक्षित श्राप की कथा सुनाई। कथा सुनने के लिए भक्तों की भीड़ लगी रही। कथा के दूसरे के दिन देवी चित्र लेखा जी ने राजा परीक्षित ने श्राप की कथा सुनाते हुए कहा कि अर्जुन के पोते और अभिमन्यु के पुत्र थे। संसार सागर से पार करने वाली नौका स्वरूप भागवत का प्रचार इन्हीं के द्वारा हुआ। पांडवों ने संसार त्याग करते समय इनका राज्याभिषेक किया था। इन्होंने नीति के अनुसार पुत्र के समान प्रजा का पालन किया। एक समय यह दिग्विजय करने को निकले वहां कुरुक्षेत्र में इन्होंने देखा एक आदमी बैल को मार रहा है वह आदमी जो की वास्तव में कलियुग था। उसको इन्होंने तलवार खींचकर आज्ञा दी की यदि तुझे अपना जीवन प्यारा है तो मेरे राज्य से बाहर हो जा। तब कलियुग ने डरकर हाथ जोड़कर पूछा कि महाराज समस्त संसार में आपका ही राज्य है फिर मै कहा जाकर रहूं। राजा ने पांच स्थान बताते हुए कहा जहां मदिरा, जुआ, जीव हिंसा, वैश्या और सुवर्ण हो वहां जाकर रहो। एक बार राजा सुवर्ण का मुकुट पहनकर आखेट खेलने के लिए गये। वहां प्यास लगने पर घूमते घूमते शमीक ऋषि के आश्रम पर पहुंचकर जल मांगा। उस समय ऋषि समाधि लगाए हुए बैठे थे। इस कारण कुछ भी उत्तर नहीं दिया। राजा के सुवर्ण मुकुट में कलियुग का वास था। उससे इनको क्यों सूझी की ऋषि घमंड के मारे मुझसे नहीं बोलता है। इन्होंने एक मरा हुआ सांप ऋषि के गले में डाल दिया। घर आकर अब जब मुकुट सिर से उतारा तो इनको ज्ञान पैदा हुआ। इधर जब ऋषि के पुत्र श्रृंगी ने यह समाचार सुना तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ उसने तुरंत ही यह श्राप दिया की आज के सातवे दिन यही तक्षक सांप राजा को डसेगा। ऋषि ने समाधि छूटने पर जब श्राप का सब हाल सुना तो बड़ा पछतावा किया। किंतु अब क्या हो सकता था। आखिर राजा के पास श्राप का सब हाल कहला भेजा। राजा ने जब यह हाल सूना तो संसार से विरक्तत होकर अपने बड़े पुत्र जन्मेजय को राजगद्दी सौंप दी और गंगा जी के किनारे पर आकर डेरा डाल दिया। वहां अनेक ऋषि मुनियों को इकट्ठा किया। संयोग से शुकदेव जी भी वहां आ गये और राजा को श्री मदभागवत की कथा सुनाई। सात दिन तक बराबर कथा सुनते रहे और भगवान में ऐसा मन लगाया की किसी बात की सुधि ना रही और सातवे दिन तक्षक सर्प ने आकर डस लिया और राजा परमधाम को प्राप्त हुए। अंत में देवी चित्रलेखा जी ने कथा सुनाते हुए कहा कि सत्य है भगवान का चरित्र भक्तिपूर्वक सुनने से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारो पदार्थ अनायास ही मिल जाते है। भगवत सुनने के लिए भारी संख्या में भक्तजन मौजूद रहे।

रिपोर्ट- भूपेन्द्र गुप्ता के साथ कपिल गुप्ता की रिपोर्ट

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