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भागवत कथा में आज भक्त ध्रुव का वर्णन

समथर(झांसी)-मोठ तहसील के ग्राम लोहागढ़ 30 जनवरी – आज की कथा महान भक्तों से संपुरित है, कथा का प्रारंभ भक्त प्रवर ध्रुव से है तो विश्राम भक्त प्रवर प्रहलाद की कथा से। महाराज ने भागवत कथा का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि राजा उत्तानपाद एक जीव है इस जीव की दो पत्निया सुरूचि एवं सुनीति । एक भक्ति का मार्ग बताती है दुसरा उससे विमुख करती है। उन्होंने कहा कि सतसंग का जो फल है वही ध्रुव कहलाता है। ध्रुव अटल है ध्रुव विश्वास है। वही सुनीति का जो पुत्र था वह अंधकार की ओर ले जाना चाहता था उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति में उम्र की कोई सीमा नही होती। जीवन में कोई विशेष संयोग आता है, तभी व्यक्ति भगवान की ओर प्रवृत्त होता है। ऐेसे ही एक पांच वर्ष के बालक के साथ हुआ।

उस बालक का नाम था ध्रुव, भगवान की प्राप्ति के लिये वन की ओर चला गया जहां देवऋषि नारद जी मिले जिससे मंत्र की दिक्षा लेकर भगवान को प्राप्त किया।

श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन व्यासपीठ पर विराजमान पुष्पांजलि दीदी (व्रन्दावन) ने उपस्थितजनों को कथा का अमृतपान करवाते हुए कहा की मानव जीवन में भक्ति और सत्संग करना आवश्यक है। भगवान के अब तक हुए अवतारों में सभी की अलग-अलग महिमा है। सत्संग की महिमा का बखान करते हुए कहा कि दुनिया भर में आज अराजकता का माहौल बन रहा है। मगर इसके बावजूद सत्संग के कारण यह पृथ्वी मौजूद है। अन्यथा कब का प्रलय हो जाता। उन्होनें कहा कि जब-जब भी धरती पर पाप और अत्याचार बढ़े है तब भगवान ने स्वयं विविध रूपों में अवतार लेकर पापियों-अत्याचारियों का संहार कर अपने भक्तों को भयमुक्त किया है। त्रेता युग में भी जब पृथ्वी पर लंका नरेश एवं राक्षसराज रावण के पाप अत्याधिक बढ़ गए थे, उस समय भगवान श्रीराम के रूप में रधुकुल में नर रूप में अवतार लेना पड़ा था।

भागवत कथा के दूसरे दिन कथावाचक पुष्पांजलि दीदी (व्रन्दावन) ने कहा कि व्यक्ति को सांसारिक भौतिक सुखों का त्याग कर ईश्वर का भजन करना चाहिए। ताकि मोक्ष की प्राप्ति हो, भगवान की लीला का कोई पार नहीं है। यह भागवत का सार है।

सैकड़ों की तदाद में औरतों व पुरुषों ने ध्यानपूर्वक श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया। इस अवसर पर पुष्पांजलि दीदी (व्रन्दावन) ने कहा कि सच्चाई के मार्ग पर चलकर ही परमात्मा को हासिल किया जा सकता है। दीदी ने बताया कि जो अमृत कथा शुकदेव ने भोले बाबा से सुनी, असल में वही कथा श्रीमद्भागवत पुराण है, जो बाद में शुकदेव ने समय आने पर लोगों को सुनाई।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति अध्यात्म जीवन ईश्वर भक्ति को त्याग कर सांसारिक सुखों के दलदल में फंसता जा रहा है। भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए सत्य भक्ति मार्ग से दूर हो रहा है। सत्य के समान कोई दूसरा धर्म नहीं है। उन्होंने धर्म का संरक्षण करने के लिए महापुरुषों एवं संत महात्माओं के साथ सत्संग कर जीवन को सफल बनाने का आह्वान किया। भजन गायकों ने भी प्रस्तुतियां देकर माहौल को भावविभोर कर दिया। दीदी के द्वारा कथा वाचन के दौरान भजनों की प्रस्तुति ने श्रद्धालुओं को भक्ति में तल्लीन होकर झूमने पर मजबूर कर दिया। शास्त्री जी के श्री मुख से भजनों की सुरीली वाणी को सुनकर श्रद्धालु मंच के समीप आकर दीदी का अभिवादन करते हुए भजनों पर झूमते रहे और कई श्रद्धालु अपने स्थान पर ही भजनों का आनन्द लेते रहे।

कथा के दूसरे दिन महाराज ने शुक्रदेव मुनि के जन्म, राजा परीक्षित के जन्म उनको ऋषि श्राप की कथा के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन में मन, वाणी, कर्म से किसी को भी कष्ट नहीं देना चाहिए। ऐसा व्यक्ति जो किसी को भी कष्ट नहीं देता वह सीधा वैकुंठ में जाता है। सद्गुरुदेव के बताए मार्ग का अनुसरण कर एवं भगवन्नाम के सुमिरन से समूचे विश्व का कल्याण संभव है।

 

रिपोर्ट यशपाल सिह समथर

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